कड़वी मगर हक़ीक़त–अवार्ड मिलते ही नहीं ख़रीदे भी जाते हैं

        (शिब्ली रामपुरी)

इस विषय पर मैं ज्यादा विस्तार से बात करूं उससे पहले मै एक मशहूर क़िस्से का ज़िक्र करना चाहूंगा जो ऋषि कपूर ने अपनी किताब खुल्लम-खुल्ला में लिखा था. इसी साल दुनिया को अलविदा कहने वाले कपूर खानदान के ऋषि कपूर ने कुछ वक्त पहले एक किताब लिखी थी जिसका नाम था खुल्लम-खुल्ला. वैसे जिस तरह का नाम किताब का रखा गया था वास्तव में ऋषि कपूर ने किताब लिखने में काफी न्याय किया और उस में बहुत सी बातें खुल्लम-खुल्ला ही लिखी हैं. जिनमें एक क़िस्सा पुरस्कार के बारे में भी ऋषि कपूर ने लिखा है. ऋषि कपूर ने किताब में लिखा है कि कैसे उन्होंने पुरस्कार खरीदा था. ऋषि कपूर खुल्लम-खुल्ला में लिखते हैं कि बॉबी और जंजीर फिल्म एक ही समय में आई थी और दोनों फिल्में अपने जमाने की सुपर डुपर हिट रहीं थीं. उस समय अमिताभ बच्चन ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि जंजीर फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर का अवार्ड उनको ही मिलेगा लेकिन यह अवार्ड ऋषि कपूर को फिल्म बॉबी के लिए मिला. दरअसल अवार्ड मिलने की वजह यह थी कि एक शख़्स ने ऋषि कपूर से आकर कहा था सर अगर आप तीस हज़ार रूपये दे दे तो मैं यह अवार्ड आपको दिलवा दूंगा. ऋषि कपूर अपनी किताब खुल्लम-खुल्ला में साफगोई के साथ लिखते हैं कि उन्होंने इस अवार्ड के लिए बगैर सोचे समझे पैसे दे दिए और फिर यह अवार्ड जंजीर को न मिलकर फिल्म बॉबी के लिए ऋषि कपूर को मिला था. ऋषि कपूर यह भी लिखते हैं कि ये अवार्ड मिलने के बाद शायद अमिताभ बच्चन ऋषि कपूर से चिढ़ गए थे.

ऋषि कपूर द्वारा अपनी किताब में यह बातें लिखे जाने से साफ इशारा मिलता है कि पुरस्कार खरीदने और बेचने का यह खेल कितना पुराना है. सभी पुरस्कार दौलत के बल पर नहीं लिए जा सकते और ना दिए जा सकते हैं लेकिन इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि बहुत लोग ऐसे हैं जो दौलत के बल पर ही अवार्ड हासिल करते हैं. यदि मैं ऐसे कुछ लोगों का नाम यहां लिख दूं तो वह मुझे भला बुरा कहना शुरू कर देंगे और समाचार पत्रों में मेरे खिलाफ आर्टिकल तक लिखना या सोशल मीडिया पर मेरे खिलाफ लिखना आरंभ कर देंगे. लेकिन उनका नाम लिए बगैर मैं यह बात कह सकता हूं कि ऐसे कई लोग हैं जिन्हें साहित्य के नाम पर अवार्ड नहीं बल्कि पैसे के दम पर अवार्ड मिले. कई लोगों ने अपनी दुकान और मकान अवॉर्डों से सजा रखे हैं.
मैं इतना काबिल नहीं हूं हालांकि मैं काफी वक़्त से लिख रहा हूं. हिंदी के साथ-साथ उर्दू के समाचार पत्रों में भी लिखता हूं तो कई जगह से मुझे अवार्ड देने की बात की जाती है तो मैं कहीं जाता नहीं क्योंकि मैं यह सोचता हूं कि अवार्ड मिलने से जो मेरा लेखन का कार्य है वह रुक जाएगा. फिर कुछ बरस से समाचार पत्रों में आर्टिकल वगैरह या पत्रकारिता करने से मैं किसी अवार्ड के काबिल नहीं हो जाता. फिर भी कुछ ऐसे प्रोग्रामों में गया था जहां पर मुझे अवार्ड देने की घोषणा की गई थी जब मैं वहां पहुंचा तो जो अवार्ड मुझे मिल रहा था और मुझसे भी सीनियर लोगों को मिल रहा था वही अवार्ड कुछ ऐसे लोगों को भी दिया गया कि मैं यह सोचने लगा कि आखिर इनका काम किया है ना तो वह साहित्यकार थे ना ही वह शायर थे ना ही वह कवि थे. समझ में नहीं आया उनको किस बात पर अवार्ड दिया गया. फिर महसूस हुआ कि शायद जान पहचान या फिर जो प्रोग्राम हुआ है उसमें मदद कर देने की एवज़ में उनको यह सब अवार्ड वगैरह दिया गया है. कुछ समय पहले एक दिलचस्प किस्सा पढ़ा था कि एक ही जगह पर अवार्ड देने की घोषणा हो रही थी तो वहां पर योग्यता के आधार पर अवार्ड दिए जा रहे थे.अवार्ड देने वाले ने अचानक एक ऐसे आदमी का नाम भी पेश कर दिया जो उस कार्यक्रम का संचालन कर रहा था और उसको सिर्फ इसलिए बढ़ावा दिया गया कि वह संचालन बहुत अच्छे तरीके से कर रहा था तो उससे भी आप अवार्ड के मेयार उसके स्तर का अंदाजा लगा सकते हैं. यहां मैं यह कहना भी गलत नहीं समझता हूं कि कुछ लोग साहित्य की सेवा नहीं बल्कि अवार्ड के लिए ही कलम चलाते हैं उनका उद्देश्य सिर्फ अवार्ड हासिल करना है.