शकील बदायूनी के जन्मदिवस पर विशेष — वो शायर जिसके अल्फ़ाज़ जिंदा है भजनों में ग़ज़लों में गीतों में

(शिब्ली रामपुरी)

बॉलीवुड में एक से बढ़कर एक गीतकार हुए लेकिन जो मक़ाम शकील बदायूनी को हासिल हुआ उस तक बहुत कम पहुंच सके. आमतौर पर शकील बदायूनी को ग़ज़ल का शायर माना जाता था लेकिन उन्होंने बॉलीवुड में भजन से लेकर रूमानियत.ग़म दर्द आदि पर भी एक से बढ़कर एक कलाम लिखे.
जब शकील ने लिखा मन तडपत हरी दर्शन को आज इस भजन को संगीत दिया नौशाद ने और आवाज दी मोहम्मद रफी ने.
यह भजन 1952 में आई फिल्म बैजू बावरा में फिल्माया गया. इसी फिल्म का एक और गीत जो आज भी लोगों की जुबान पर है ओ दुनिया के रखवाले.
1960 में रिलीज हुई ऐतिहासिक फिल्म मुग़ल-ए-आज़म के गीत शकील बदायूनी ने लिखे थे. यह फिल्म जहां अपने दमदार डायलॉग के लिए मशहूर है वहीं इसके गीत आज भी काफी पसंद किए जाते हैं और हमेशा पसंद किए जाते रहेंगे. इश्क की बात हुई तो शकील ने मेरे महबूब में जो गीत लिखे कमाल के थे.
एक और ऐतिहासिक फिल्म मदर इंडिया जब 1957 में रिलीज हुई तो उसके गानों ने खूब धाक जमा दी. इस फिल्म का एक गीत दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा आज भी काफी सराहा जाता है और जीवन में जो इंसान संघर्ष करता है मेहनत करता है उसको एक हौसला देने का काम यह गीत करता है. शकील बदायूनी को तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

शकील का एक शेर देखिए

अब तो खुशी का गम है ना गम की खुशी मुझे

बेहिस बना चुकी है बहुत जिंदगी मुझे

ताजमहल की खूबसूरती शकील कुछ इस तरह लिखते हैं

एक शहंशाह ने बनवाके हंसी ताजमहल

सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है

उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं में 3 अगस्त 1916 को शकील बदायूनी का जन्म हुआ था. जब मशहूर संगीतकार नौशाद से शकील बदायूनी की पहली मुलाकात हुई तो उस मुलाकात के दौरान नौशाद साहब ने उनसे कुछ लिखने को कहा तो शकील ने लिखा

हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे
हर दिल में मोहब्बत की हम आग लगा देंगे

यह नौशाद साहब को बहुत पसंद आया और फिर शकील और नौशाद की क्या जोड़ी जमी इसके बारे में ज्यादा विस्तार से लिखने की जरूरत नहीं है. करीब 20 साल तक नौशाद के साथ शकील ने काम किया. 20 अप्रैल 1970 को शकील बदायूनी इस दुनिया को अलविदा कह गए लेकिन उनके गीत हमेशा उनकी याद दिलाते रहेंगे.