उत्तराखंड कांग्रेस में एकता के दावे पर सवाल, सेलाकुई में गुटबाजी का नजारा
प्रीतम सिंह की फटकार में छिपा कांग्रेस का दर्द: ऐसे कैसे जीतेगी कांग्रेस?
डॉ जमशेद उस्मानी
एडिटर
देहरादून। राजनीति में एक कहावत अक्सर सुनने को मिलती है कि किसी पार्टी को हराने के लिए हमेशा उसके विरोधियों की जरूरत नहीं होती, कभी-कभी उसके अपने लोग ही उसकी हार की वजह बन जाते हैं। उत्तराखंड कांग्रेस की मौजूदा परिस्थितियों को देखकर यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है कि क्या पार्टी ने पिछले चुनावों की गलतियों से कोई सबक लिया है, या फिर आपसी खींचतान का पुराना सिलसिला अब भी जारी है?
करीब एक दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा को राजनीतिक रूप से घेरने की नहीं, बल्कि अपने संगठन को भीतर से मजबूत करने की भी है। विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह अपनी पुरानी कमजोरियों की पहचान करेगी, नेताओं के बीच तालमेल बढ़ाएगी और कार्यकर्ताओं को एक साझा लक्ष्य के लिए तैयार करेगी। लेकिन सहसपुर विधानसभा क्षेत्र के सेलाकुई में निकली न्याय यात्रा के दौरान सामने आया घटनाक्रम इन उम्मीदों पर सवाल खड़े करता है।
उत्तराखंड कांग्रेस की ओर से सेलाकुई स्थित एक वेडिंग पॉइंट से पूर्व नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता प्रीतम सिंह की अगुवाई में न्याय यात्रा निकाली गई। इस कार्यक्रम में पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत, कांग्रेस नेता आर्येंद्र शर्मा, गुलजार अहमद, जिला कांग्रेस अध्यक्ष संजय किशोर सहित पार्टी के कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता शामिल हुए।
कार्यक्रम का मकसद पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट करना तथा सरकार के खिलाफ राजनीतिक संदेश देना था। लेकिन यात्रा की शुरुआत में ही पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत और कांग्रेस नेता आर्येंद्र शर्मा के समर्थकों की ओर से अपने-अपने नेताओं के समर्थन में नारेबाजी शुरू हो गई। नारेबाजी तेज होने के साथ माहौल असहज हो गया और पार्टी के कार्यक्रम में आपसी प्रतिस्पर्धा साफ दिखाई देने लगी।
स्थिति को संभालने के लिए प्रीतम सिंह को खुद माइक लेकर कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचना पड़ा। उन्होंने समर्थकों को फटकार लगाई और कहा कि अगर नारे लगाने हैं तो कांग्रेस जिंदाबाद के नारे लगाएं तथा सरकार के खिलाफ आवाज उठाएं। इसी दौरान उनका सवाल— “ऐसे कैसे जीतेगी कांग्रेस?”—पार्टी की मौजूदा स्थिति पर एक बड़ी राजनीतिक टिप्पणी बन गया।
प्रीतम सिंह के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हुआ और यात्रा आगे बढ़ सकी। हालांकि, इस घटनाक्रम ने कांग्रेस की एकजुटता के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को लेकर बहस छेड़ दी।
किसी भी राजनीतिक दल में नेताओं के अपने समर्थक होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में नेतृत्व को लेकर प्रतिस्पर्धा भी होती है और कार्यकर्ताओं को अपने पसंदीदा नेता के समर्थन में आवाज उठाने का अधिकार भी है। लेकिन जब पार्टी के साझा कार्यक्रम में व्यक्तिगत समर्थन की होड़ संगठन के उद्देश्य पर भारी पड़ने लगे, तब सवाल उठना लाजिमी है।
राजनीतिक दलों में व्यक्तिगत लोकप्रियता तभी उपयोगी साबित होती है, जब वह संगठन की ताकत बढ़ाए। यदि नेता के समर्थक पार्टी के मंच पर ही एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करने लगें, तो इसका संदेश आम कार्यकर्ताओं और जनता के बीच अच्छा नहीं जाता।
सेलाकुई की घटना को केवल नारेबाजी का मामूली विवाद मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपे राजनीतिक संकेत को अनदेखा करना आसान नहीं होगा। यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या कांग्रेस के अलग-अलग नेता अपने समर्थकों को पार्टी की सामूहिक रणनीति के अनुसार चलाने में सफल हो पा रहे हैं?
उत्तराखंड में कांग्रेस की चुनावी चुनौतियों पर चर्चा के दौरान अक्सर भितरघात, आपसी मतभेद और नेताओं के बीच तालमेल की कमी जैसे आरोप सामने आते रहे हैं। हालांकि, किसी चुनाव में पार्टी की हार के लिए केवल अंदरूनी गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। चुनावी परिणामों पर नेतृत्व, उम्मीदवारों का चयन, संगठन की मजबूती, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं के मुद्दों सहित कई कारकों का प्रभाव पड़ता है।
इसके बावजूद, यदि पार्टी के भीतर मतभेद सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देने लगें, तो विरोधियों को हमला करने का मौका जरूर मिलता है। कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित हो सकता है और मतदाताओं के बीच यह धारणा बन सकती है कि पार्टी अभी अपने आंतरिक मामलों को सुलझाने में ही उलझी हुई है।
कांग्रेस के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि क्या वह पिछले चुनावों के अनुभवों का गंभीर विश्लेषण कर रही है? क्या पार्टी ने यह तय किया है कि संगठनात्मक फैसलों को लेकर असहमति होने के बावजूद सार्वजनिक मंचों पर एकजुटता कैसे बनाए रखी जाएगी? और क्या वरिष्ठ नेता अपने समर्थकों को अनुशासन तथा सामूहिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने के लिए तैयार हैं?
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ते राजनीतिक माहौल में कांग्रेस के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। सरकार के कामकाज, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और प्रदेश के विकास जैसे मुद्दों पर विपक्ष जनता के बीच अपनी जगह बना सकता है। लेकिन इसके लिए केवल सरकार की आलोचना पर्याप्त नहीं होगी; पार्टी को अपना विश्वसनीय विकल्प भी प्रस्तुत करना होगा।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि जनता के सामने उसकी पहचान कुछ बड़े नेताओं की व्यक्तिगत ताकत से नहीं, बल्कि एकजुट नेतृत्व, सक्रिय संगठन और स्पष्ट राजनीतिक एजेंडे से बनेगी। चुनाव के समय मंच साझा कर लेना एकता नहीं है। वास्तविक एकता तब दिखाई देती है, जब टिकट वितरण, नेतृत्व की भूमिका, चुनाव प्रचार और स्थानीय राजनीतिक फैसलों के दौरान भी संगठन की प्राथमिकता बनी रहे।
यदि हर नेता अपने समर्थकों की संख्या और अपने प्रभाव का प्रदर्शन करने में जुटा रहेगा, तो पार्टी का सामूहिक संदेश कमजोर पड़ सकता है। इसके विपरीत, यदि वरिष्ठ नेता अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को संगठनात्मक अनुशासन के दायरे में रखते हैं, तो यही कार्यकर्ता चुनावी ताकत बन सकते हैं।
सेलाकुई में प्रीतम सिंह का हस्तक्षेप इस बात का संकेत था कि कम से कम उस मौके पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने व्यक्तिगत नारेबाजी के बजाय संगठन को प्राथमिकता देने की जरूरत महसूस की। उनका सवाल—“ऐसे कैसे जीतेगी कांग्रेस?”—सिर्फ मौके पर मौजूद कार्यकर्ताओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे संगठन के लिए आत्ममंथन का विषय है।
राजनीति में असली परीक्षा नारों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि जनता का विश्वास जीतने की क्षमता से होती है। यदि कांग्रेस के नेता इस संदेश को समझते हैं, तो सेलाकुई की घटना उनके लिए सुधार का अवसर बन सकती है। लेकिन यदि इसे महज एक दिन का विवाद मानकर भुला दिया गया, तो यही सवाल भविष्य में और गंभीर रूप से सामने आ सकता है।
उत्तराखंड कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि भाजपा को कैसे चुनौती दी जाए, बल्कि यह भी है कि पार्टी अपने भीतर विश्वास, अनुशासन और साझा नेतृत्व की संस्कृति कैसे विकसित करे।
सेलाकुई की न्याय यात्रा में उठे नारे कुछ समय बाद भले ही शांत हो गए हों, लेकिन उनसे पैदा हुआ राजनीतिक सवाल अभी बाकी है। क्या कांग्रेस के नेता अपने समर्थकों को पार्टी की जीत के लिए एकजुट कर पाएंगे? क्या संगठन व्यक्तिगत वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठ सकेगा? और क्या 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को एक साझा दिशा देने में सफल होगी?
कांग्रेस को याद रखना होगा कि चुनावी मैदान में जीत केवल विरोधियों की कमजोरियों से नहीं मिलती, बल्कि अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने से भी मिलती है। यदि पार्टी के नेता ही संगठन से ऊपर दिखाई देने लगें, तो जनता के सामने एक मजबूत विकल्प बनने का सपना कमजोर पड़ सकता है।
सेलाकुई की घटना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने कांग्रेस को आईना दिखाने का काम किया है। अब देखना यह है कि पार्टी उस आईने में अपनी तस्वीर देखकर सुधार करती है या फिर पुरानी गलतियों को दोहराते हुए एक बार फिर चुनावी परीक्षा में उतरती है।






