452 पंजीकृत मदरसों में से 227 हुए बंद, 19 पर लगी सील; 114 मदरसों की मान्यता शिक्षा विभाग में लंबित
पीएम पोषण योजना शुरू नहीं होने से विद्यार्थियों की मुश्किलें बढ़ीं, धार्मिक शिक्षा की पुस्तकों पर भी स्थिति स्पष्ट नहीं
देहरादून। उत्तराखंड में मदरसों की नई व्यवस्था लागू होने के बाद भी विद्यार्थियों को बुनियादी शैक्षिक सुविधाओं के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। मदरसा बोर्ड के 30 जून 2026 को समाप्त होने के बाद शिक्षा व्यवस्था को नए ढांचे के तहत संचालित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है, लेकिन बच्चों को मध्याह्न भोजन, पूरी पाठ्यपुस्तकें और धार्मिक शिक्षा से जुड़ी किताबें उपलब्ध कराने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अब तक पूरी स्पष्टता नहीं आ पाई है। व्यवस्था में बदलाव के सवा तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पीएम पोषण योजना के तहत भोजन उपलब्ध कराने के लिए स्पष्ट आदेश जारी नहीं होने से सवाल उठ रहे हैं कि नई व्यवस्था में विद्यार्थियों की जरूरतों को प्राथमिकता कब मिलेगी।
प्रदेश के देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल सहित विभिन्न जिलों में मदरसों को इन सुविधाओं से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई संस्थानों में एनसीईआरटी की किताबें पूरी नहीं पहुंचने की बात सामने आई है। वहीं, कक्षा आठ तक धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार होने के बावजूद उसे लागू नहीं किया गया है। धार्मिक शिक्षा की पुस्तकों को सरकार उपलब्ध कराएगी या मदरसों को स्वयं उनकी व्यवस्था करनी होगी, इस संबंध में भी स्थिति स्पष्ट नहीं बताई जा रही है।
भोजन योजना को लेकर अब तक स्पष्ट आदेश नहीं
मदरसों के विद्यार्थियों को पीएम पोषण योजना का लाभ दिलाने के लिए अब तक स्पष्ट आदेश जारी नहीं होने का मामला प्रमुखता से सामने आया है। इस संबंध में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी शिक्षा निदेशालय को पत्र लिख चुके हैं। निदेशालय की ओर से जिलों से विद्यार्थियों की संख्या, यूडाइस नंबर और अन्य आवश्यक जानकारियों के साथ रिपोर्ट मांगी गई थी।
बताया गया है कि संबंधित जानकारी भेजे जाने के बावजूद योजना शुरू नहीं हो पाई है। ऐसे में मदरसों में पढ़ने वाले उन बच्चों के अभिभावकों और संचालकों के सामने चिंता बनी हुई है, जो नई व्यवस्था के तहत सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने की उम्मीद कर रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के साथ विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा और सुविधाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एनसीईआरटी की किताबें अधूरी, धार्मिक पाठ्यक्रम लागू होने का इंतजार
नई व्यवस्था के तहत मदरसों में आधुनिक विषयों की पढ़ाई को व्यवस्थित करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं, लेकिन पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता को लेकर समस्याएं सामने आ रही हैं। कई मदरसों में एनसीईआरटी की किताबें अधूरी होने से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका है।
इसके साथ ही कक्षा आठ तक धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार होने के बावजूद उसके क्रियान्वयन में देरी हो रही है। धार्मिक शिक्षा की पुस्तकों की उपलब्धता को लेकर भी स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है। ऐसे में मदरसा संचालकों के सामने यह सवाल है कि पाठ्यक्रम लागू होने के बाद विद्यार्थियों को जरूरी पुस्तकें समय पर कैसे उपलब्ध कराई जाएंगी।
प्राधिकरण की ओर से कक्षा नौ से 12 तक दीनी तालीम का पाठ्यक्रम तैयार किए जाने की बात कही गई है। इसके जल्द प्रकाशित होने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि, विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम और पुस्तकों की सुविधा किस समय तक उपलब्ध होगी, इस बारे में निश्चित समयसीमा स्पष्ट नहीं है।
452 पंजीकृत मदरसों में से 227 स्वतः बंद, 19 किए गए सील
उत्तराखंड में पहले कुल 452 मदरसे पंजीकृत थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें से 227 मदरसे स्वयं बंद हो गए, जबकि 19 मदरसों को सील किया जा चुका है। इस प्रकार बड़ी संख्या में पुराने पंजीकृत मदरसों का संचालन बंद हो गया है।
मदरसा बोर्ड की व्यवस्था समाप्त होने के बाद मान्यता की प्रक्रिया नए सिरे से आगे बढ़ी है। अब तक शिक्षा विभाग से 76 मदरसों और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से 35 मदरसों को मान्यता मिलने की जानकारी है। वहीं, 114 मदरसों की मान्यता से संबंधित प्रक्रिया शिक्षा विभाग में लंबित बताई जा रही है।
इन आंकड़ों के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल उन बच्चों की पढ़ाई को लेकर है, जो पहले बंद हो चुके मदरसों में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इन विद्यार्थियों को दूसरे संस्थानों में दाखिला दिलाने, उनकी पढ़ाई जारी रखने और उनकी शैक्षिक स्थिति की निगरानी करने के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है, यह स्पष्ट होना आवश्यक है।
बंद मदरसों के बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी किसकी?
मुस्लिम मामलों के जानकार खुर्शीद अहमद सिद्दीकी ने बंद मदरसों और वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर नीति स्पष्ट किए जाने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि कई मदरसों का संचालन समुदाय के लोगों के चंदे से होता था। ऐसे संस्थानों के बंद होने के बाद वहां पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी और उनकी निगरानी को लेकर स्पष्ट नीति होनी चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब बड़ी संख्या में मदरसे बंद हो चुके हैं, तो वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा और यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रह जाए।
यह मुद्दा केवल मदरसों की मान्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे बच्चों की शिक्षा की निरंतरता, स्कूलों में प्रवेश, पाठ्यक्रम की उपलब्धता और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच भी जुड़ी हुई है। ऐसे में संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय और स्पष्ट दिशा-निर्देशों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
प्राधिकरण के ढांचे और कर्मचारियों के वेतन का मामला भी लंबित
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का प्रशासनिक ढांचा स्वीकृत नहीं होने से उसके कामकाज पर भी असर पड़ने की बात सामने आई है। बताया गया है कि प्राधिकरण के ढांचे से संबंधित प्रस्ताव शासन में लंबित है। इसके अतिरिक्त कर्मचारियों को तीन महीने से वेतन नहीं मिलने की बात भी सामने आई है।
यदि प्रशासनिक ढांचे और कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों का शीघ्र समाधान नहीं होता है, तो मान्यता, पाठ्यक्रम, पुस्तकों की उपलब्धता और अन्य शैक्षिक सुविधाओं से संबंधित कार्यों में देरी की आशंका बनी रह सकती है। हालांकि, इन मामलों में अंतिम स्थिति स्पष्ट करने के लिए शासन और संबंधित विभागों की ओर से आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।
प्राधिकरण अध्यक्ष बोले—प्रावधानों के तहत मिलेंगे सभी लाभ
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी का कहना है कि जो प्रावधान निर्धारित किए गए हैं, उनके अंतर्गत मदरसों को सभी लाभ उपलब्ध कराए जाएंगे। उन्होंने बताया कि पीएम पोषण योजना के तहत भोजन की सुविधा शुरू कराने के लिए शिक्षा विभाग के साथ लगातार समन्वय किया जा रहा है। पुस्तकों से संबंधित विषय को भी संबंधित स्तर पर उठाया जाएगा।
उन्होंने यह भी बताया कि कक्षा नौ से 12 तक दीनी तालीम का पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है और इसे जल्द प्रकाशित किया जाएगा।
बच्चों के हित में समयबद्ध निर्णय की जरूरत
उत्तराखंड में मदरसों की नई व्यवस्था के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक बदलावों को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने की है। मान्यता प्रक्रिया, भोजन योजना, एनसीईआरटी की पुस्तकों की उपलब्धता, धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम और बंद मदरसों के विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े प्रश्नों का समाधान जरूरी है।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार का वास्तविक लाभ तभी मिल सकेगा, जब विद्यार्थियों को समय पर किताबें, भोजन और पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों। अब देखना होगा कि शासन, शिक्षा विभाग और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण इन लंबित मामलों पर कितनी जल्दी निर्णय लेते हैं और नई व्यवस्था में पढ़ने वाले बच्चों को राहत कब तक मिल पाती है।






