Monday, November 2, 2026
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वोट चाहिए, हिस्सेदारी नहीं! ओवैसी से परहेज की सियासत पर बड़ा सवाल

मुस्लिम समाज सिर्फ वोट देने के लिए है या सत्ता में हिस्सेदारी के लिए भी ?

शिब्ली रामपुरी

              ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस बात के फायदे गिनाते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी का गठबंधन समाजवादी या कांग्रेस से नहीं होगा तो फिर यूपी में अखिलेश यादव और कांग्रेस पॉलिटिक्स में बहुत बड़ा कमाल कर सकती हैं और अखिलेश यादव सत्ता तक पहुंच सकते हैं. ओवैसी के गठबंधन में होने से वोटो का बहुत ज्यादा बिखराव होगा और इससे बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है? इस तरह की बातें कहने वाले कम नहीं हैं लेकिन यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि अगर असदुद्दीन ओवैसी को गठबंधन में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस शामिल कर लेते हैं तो गठबंधन के तहत कुछ सीटों पर वह राज़ी हो जाएंगे और फिर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस उस होने वाले नुकसान से खुद को बचाने में कामयाब रहेगी कि जो नुकसान असदुद्दीन ओवैसी को गठबंधन में शामिल न करने से हो सकता है.
पूर्व में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुआ तब कई सीटों पर देखा गया कि असदुद्दीन ओवैसी के उम्मीदवार उतारने से समाजवादी पार्टी को नुकसान हुआ और सपा के कई उम्मीदवार चुनावी मैदान में पराजित हो गए. इसी तरह के हालात बिहार में भी देखने को मिले वहां पर भी बहुत सारे लोगों ने तेजस्वी यादव के हारने की वजह असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को बताया. यहां यह बात भी काबिले गौर हो कि असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के पूर्व में हुए विधानसभा चुनाव और बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में गठबंधन करने का प्रस्ताव सपा और तेजस्वी यादव की पार्टी के साथ रखा था लेकिन यूपी और बिहार दोनों जगह असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया और अब भी उत्तर प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से गठबंधन करने के इच्छुक हैं और वह खुले तौर पर इसको कह भी चुके हैं.
जो लोग यह बात बोल रहे हैं कि असदुद्दीन ओवैसी तो भारतीय जनता पार्टी की बी टीम है और वह भाजपा के इशारे पर चुनावी मैदान में काम करते हैं और ऐसी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारते हैं कि जहां पर मुस्लिम वोट काफ़ी संख्या में होता हैं लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो आरोप ओवैसी पर लगता है वह अभी तक भी साबित नहीं हो सका है और इसके अलावा यह भी ध्यान देने की बात है कि असदुद्दीन ओवैसी किसी भी राज्य के विधानसभा चुनाव में कितनी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारते हैं?
आज कई विपक्षी पार्टियां हैं जो मुसलमानों की बदहाली का जिम्मेदार भारतीय जनता पार्टी को ठहराती हैं लेकिन जरा यह सोचिए कि खुद इन पार्टियों ने सत्ता में रहते हुए मुस्लिम समाज के विकास के लिए उनकी तरक्की के लिए उनकी एजुकेशन के लिए कितने काम किए हैं? भारतीय जनता पार्टी की कथनी और करनी में तो कोई फर्क नजर नहीं आता है क्योंकि भाजपा जो कहती है वह करती है जबकि अधिकतर विपक्षी पार्टियों की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर साफ नजर आता है.
यह एक कड़वा सच है और जिसे किसी भी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि हालत यह हो चुकी है कि चुनाव में मुस्लिम वोट तो चाहिएं लेकिन कई बार मुस्लिम समाज के लोगों को वह लोग ही मंच पर देखना पसंद नहीं करते जिनकी राजनीतिक नैया अधिकतर मुस्लिम वोटो के सहारे ही पार लगती आई है. मुस्लिम वोटो की चाहत रखने वालों से उम्मीद तो यह की जानी चाहिए कि वह यह बताएंगे कि यदि हम चुनाव में कामयाब हो जाते हैं तो हम मुसलमानों की तरक़्क़ी उनकी खुशहाली और उनकी एजुकेशन के लिए क्या काम करेंगे? लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि वह तो बहुत सारे ऐसे मुद्दे होते हैं कि उसमें मुस्लिम नाम तक लेने से डरते हैं कि कहीं उनका राजनीतिक तौर पर कोई नुकसान ना हो जाए. ओवैसी की राजनीतिक विचारधारा से सहमति या असहमति अपनी जगह है लेकिन सवाल यह है कि ओवैसी जैसे नेता को गठबंधन में आखिर क्यों शामिल नहीं किया जा रहा है जबकि गठबंधन में किसी दूसरी पार्टी से कोई परहेज नहीं है. लोकसभा चुनाव के दौरान तो एक मंच पर वह राजनीतिक पार्टियां भी एकजुटता प्रदर्शित करती हुई दिखाई दी थी कि जिनकी आपसी विचारधारा कभी मेल नहीं खाती थी. जहां तक विपक्षी पार्टियों के कभी सत्ता में रहते विकास कार्यों की बात है तो यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार में भी बहुत सारे ऐसे विकास कार्य हुए हैं कि जिनका सीधा लाभ मुस्लिम समाज को मिला है. ऐसे में आपसी गठबंधन को मजबूत करने की जरूरत है क्योंकि बाद में फिर राजनीतिक दल चुनाव में हारने के बाद पछताते हैं कि जिससे गठबंधन नहीं किया था वह खुद तो जीत नहीं पाए लेकिन उसने हमारा इतनी सीटों पर नुकसान कर दिया है.

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