क्या हम मौलाना आज़ाद के ख़्वाबों का भारत बना पाए?

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शिक्षा, कौशल और सामाजिक जागरूकता पर एक ज़रूरी सवाल

> “अगर तुम सिर्फ़ अपने लिए ज़िंदा हो तो इसका मतलब यही है कि तुम अपनी कौम के लिए ज़िंदा लाश हो।”
> — मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
आज 11 नवंबर है… उनकी पुण्यतिथि।
वो शख़्स जिसने किताबों से आज़ादी की लौ जलाई,
जिसने कहा था — “शिक्षा वो जादू है जो अंधेरे को चीर सकता है।”
लेकिन आज…
हमारे बच्चे स्कूल जाते हैं तो डरते हैं,
हमारे नौजवान डिग्री लेकर भी बेरोज़गार रोते हैं, क्योंकि कौशल नहीं होती l
हमारी माएँ-बहनें अभी भी अंधविश्वास की ज़ंजीरों में जकड़ी हैं।
क्या यही वो भारत है जिसके लिए आज़ाद साहब ने कलम उठाई थी ❓
नहीं।
अब समय है ज़िंदा होने का, न कि ज़िंदा लाश बनने का।
💡 आज एक वादा कीजिए:
– अपने मोहल्ले की जिम्मेदारी लीजिए की कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा l
– एक बेरोज़गार को स्किल सिखाने का।
– एक औरत को उसका हक़ दिलाने का।
✊ कौम की ज़िंदगी तुम्हारी ज़िंदगी है।
अगर तुम उठोगे, तो कौम उठेगी।
अगर तुम रुकोगे, तो इतिहास तुम्हें माफ़ नहीं करेगा।

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