रमज़ान का महीना अपने आख़िरी पड़ाव पर है। मस्जिदों में इबादत की रौनक है, बाजारों में हलचल है, बच्चों की आंखों में ईदी के सपने हैं और घरों में सेवइयों की खुशबू। लेकिन ईद सिर्फ एक त्योहार नहीं है। ईद एक एहसास है। एक पैगाम है। और यह पैगाम है — मोहब्बत का, बराबरी का और इंसानियत का।
अगर थोड़ा ठहरकर सोचें तो समझ में आता है कि रमज़ान हमें सिर्फ भूख और प्यास सहने की ट्रेनिंग नहीं देता। रमज़ान हमें इंसान बनने की ट्रेनिंग देता है। यह हमें सिखाता है कि अपने अंदर की नफरत को कम करें और दूसरों के लिए दिल में जगह बढ़ाएं।
ईद उसी ट्रेनिंग का जश्न है।
आज जब देश के माहौल को देखते हैं तो एक सवाल मन में उठता है। पिछले कुछ सालों से हमारे समाज में बातों का लहजा बदल गया है। बहस की जगह बहसियत आ गई है, मतभेद की जगह मनभेद पैदा किए जा रहे हैं। टीवी की स्क्रीन से लेकर सोशल मीडिया तक, जैसे किसी को किसी से लड़ाने की जल्दी है।
लेकिन भारत की असली पहचान यह नहीं है।
भारत की पहचान गंगा-जमुनी तहज़ीब है। यहां सदियों से ईद की सेवइयां पड़ोस के घरों में जाती रही हैं और दीवाली की मिठाइयां मुसलमानों के घरों में पहुंचती रही हैं। यह मुल्क नफरत से नहीं, मोहब्बत से बना है।
ऐसे में इस साल की ईद मुसलमानों के लिए सिर्फ खुशी का मौका नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी मौका है।
जिम्मेदारी यह कि हम अपने हमवतन भाइयों तक मोहब्बत का पैगाम और ज्यादा मजबूती से पहुंचाएं। अगर कहीं नफरत की आवाज उठती है, तो उसके जवाब में हम प्यार की आवाज बुलंद करें। अगर कोई दीवार खड़ी करने की कोशिश करे, तो हम पुल बनाने की कोशिश करें।
क्योंकि इस्लाम की बुनियाद ही रहमत और मोहब्बत पर है।
हजरत मोहम्मद ﷺ को “रहमतुल्लिल आलमीन” कहा गया — यानी पूरी दुनिया के लिए रहमत। यह पैगाम सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं था, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए था।
इसलिए ईद के दिन जब हम नमाज़ पढ़कर गले मिलें, तो यह गले मिलना सिर्फ अपने लोगों तक सीमित न रहे। कोशिश हो कि हमारे पड़ोसी, हमारे दोस्त, हमारे दूसरे धर्मों के भाई भी इस खुशी में शामिल हों। क्योंकि ईद की असली मिठास तभी है जब उसमें सबकी हिस्सेदारी हो।
आज वक्त यह नहीं पूछ रहा कि कौन किस मजहब का है। वक्त यह पूछ रहा है कि कौन इंसानियत के साथ खड़ा है।
और शायद यही ईद का असली पैगाम भी है —
कि अगर नफरत फैल रही है तो मोहब्बत को और ज्यादा फैलाओ।
अगर दिलों के बीच दूरी बढ़ रही है तो कदम आगे बढ़ाकर दूरी कम करो।
हो सकता है इससे सब कुछ तुरंत न बदल जाए, लेकिन इतिहास गवाह है कि मोहब्बत की छोटी-छोटी कोशिशें ही बड़े बदलाव की शुरुआत बनती हैं।
तो आइए, इस ईद पर एक छोटा सा इरादा करें।
हम नफरत का जवाब नफरत से नहीं देंगे।
हम मोहब्बत का दिया जलाएंगे।
और अपने देश के हर भाई तक यह पैगाम पहुंचाएंगे कि
ईद सिर्फ मुसलमानों की खुशी नहीं,
यह इंसानियत की मुस्कान है।
ईद मुबारक। 🌙




