26 जनवरी: बिना आर्थिक बराबरी के अधूरी जम्हूरियत
आज 26 जनवरी है। झंडा लहराएगा। परेड होगी और टीवी स्क्रीन पर राष्ट्रवाद पूरे HD में दिखाई देगा। लेकिन कैमरे जिस तरफ़ नहीं जाते, वहीं से गणतंत्र की असली हालत समझ में आती है। सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि हम वोट डाल पा रहे हैं या नहीं।
सवाल यह है कि क्या हर नागरिक बराबरी से ज़िंदगी जी पा रहा है?
क्योंकि जम्हूरियत सिर्फ़ राजनीतिक अधिकारों का नाम नहीं है। अगर ऐसा होता, तो पेट खाली होने पर भी लोकतंत्र भरा हुआ लगता। आज हमारे देश में गरीब और गरीब होता जा रहा है,
अमीर और अमीर। बीच का वर्ग धीरे-धीरे ग़ायब हो रहा है—
जैसे किसी रिपोर्ट से कोई inconvenient data हटा दिया गया हो।
संविधान बराबरी की बात करता है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि बराबरी आज बैंक बैलेंस से नापी जा रही है। जिसके पास पैसा है, उसके लिए सिस्टम तेज़ है। जिसके पास नहीं है, उसके लिए सिस्टम में “नेटवर्क एरर” आ जाता है। यह सिर्फ़ आर्थिक सवाल नहीं है, यह लोकतंत्र का सवाल है। क्योंकि जिस आदमी की पूरी ज़िंदगी रोज़ी-रोटी की लड़ाई में निकल जाए, वह लोकतंत्र पर बहस कब करेगा? वह संविधान कब पढ़ेगा? वह सवाल कब पूछेगा? यही वजह है कि
आर्थिक असमानता जम्हूरियत की जड़ों में लगने वाला दीमक है। दिखाई नहीं देता, लेकिन धीरे-धीरे पूरा ढांचा खोखला कर देता है। आज हम गर्व से कहते हैं— हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। लेकिन यह भी पूछना पड़ेगा—
क्या हम दुनिया का सबसे असमान लोकतंत्र बनते जा रहे हैं? जब चंद लोगों के हाथ में देश की ज़्यादातर दौलत सिमट जाए, तो नीतियां जनता के लिए नहीं, दौलत की हिफ़ाज़त के लिए बनती हैं। और फिर कहा जाता है—
सबको बराबर मौक़े मिले हैं। मौक़े काग़ज़ पर बराबर हो सकते हैं,
ज़मीन पर नहीं। गणतंत्र की मजबूती का मतलब है— सिर्फ़ वोट देने का हक़ नहीं, सम्मान के साथ जीने की गारंटी।
रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और इलाज— ये कोई मुफ़्त की खैरात नहीं, ये लोकतंत्र की बुनियाद हैं। 26 जनवरी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी सिर्फ़ झंडा फहराने से पूरी नहीं होती। जब तक भूख़ आज़ाद नहीं होगी, तब तक नागरिक भी पूरी तरह आज़ाद नहीं होगा।
आज ज़रूरत है धर्म और पहचान की बहस से निकलकर रोज़गार, मज़दूरी, महंगाई और असमानता पर बात करने की। क्योंकि नफ़रत से चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन जम्हूरियत नहीं बचाई जा सकती। 26 जनवरी एक दिन है।
लेकिन आर्थिक न्याय एक रोज़ की लड़ाई है। अगर यह लड़ाई हार गए, तो परेड चलती रहेगी, और लोकतंत्र धीरे-धीरे चलता बनेगा।
जय हिन्द। जय संविधान। ।




