राष्ट्रीय

आजाद हिंद फौज के जनरल शाहनवाज हुसैन एक महान स्वतंत्रता सेनानी जिस देश भूलता जा रहा है  *एक महान स्वतंत्रता सेनानी जिस देश भूलता जा रहा है* 

आजाद हिंद फौज के जनरल शाहनवाज हुसैन

 *एक महान स्वतंत्रता सेनानी जिस देश भूलता जा रहा है*

अमानुल्लाह उस्मानी

    भारत की स्वतंत्रता में आजाद हिंद फौज का बहुत बड़ा महत्व है इसमें कोई शक नहीं की आजाद हिंद फौज का काम महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस ने किया था आजाद हिंद फौज में सुभाष चंद्र बोस के बाद अगर किसी का मुकाम आता है तो वह है जनरल शाहनवाज हुसैन जनरल शाहनवाज हुसैन ना सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया बल्कि आजादी के बाद भी जिंदगी भर दे सेवा में लग रहे लेकिन अफसोस हमारे आने वाली नहीं पीढ़ी इस महान स्वतंत्रता सेनानी के योगदान तो बड़ी चीज है आज नाम से भी वाकिफ नहीं है

एक किस्सा बहुत प्रचलित है कि सन चालीस के दशक के उत्तरार्ध में एक शख्स ने एक कार एक्सीडेंट के पीड़ित परिवार की बहुत मदद की थी. खासकर उस परिवार की लड़की की मदद उस शख्स ने की थी. वह शख्स उन दिनों ब्रिटिश सेना में कैप्टन के ओहदे पर थे और कुछ समय बाद ही, जब वह आजाद हिंद फौज (आइएनए) के मेजर जनरल बन गए तो चारों तरफ उनके नाम की धूम मच गई. उनका नाम था जनरल शाहनवाज खान.

कई जानकारों का दावा है कि जिस लड़की की मदद जनरल (तब कैप्टन) शाहनवाज खान ने की थी, उसका नाम लतीफ फातिमा था. और शाहनवाज खान ने उस लड़की को एक तरह से अपनी गोद ली हुई बेटी बना लिया था. शाहनवाज खान फातिमा को इतना मानते थे कि 1959 में जब उसकी शादी हुई तो वह जनरल शाहनवाज खान के घर पर ही हुई थी.

लतीफ फातिमा और उनके शौहर ताज मोहम्मद खान की 1965 में एक बेटा हुआ और वह बेटा भी काफी चमकता सितारा है. नाम है शाहरुख खान. बेशक, शाहनवाज खान का नाम लेते ही जेहन में एक नारा जरूर गूंजता हैः लालकिले से आई आवाज, सहगल, ढिल्लो, शाहनवाज. यह नारा पुराने लोगों के जेहन में आज भी सुरक्षित है.

इस तरह जनरल शाहनवाज खान का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में स्वतंत्र भारतीय सेना के ‘कमांडर-इन-चीफ’ जनरल शाहनवाज खान के बलिदान और कारनामे अभी भी राष्ट्र के लिए एक संपत्ति हैं. जनरल शाहनवाज खान देशभक्ति और राष्ट्रवाद के प्रतीक बने रहे.

जनरल शाहनवाज खान ही वह शख्स थे, जिन्होंने लाल किले में ब्रिटिश सरकार के झंडे यूनियन जैक की जगह तिरंगा फहराया, जहां आजादी के बाद से तिरंगा लहरा रहा है. दिलचस्प बात यह है कि जब मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे, तो वे अपना पूरा परिवार पाकिस्तान में छोड़कर भारत आ गए.

उनके परिवार से जुड़े लोग आज भी पाकिस्तानी सेना में ऊंचे पदों पर काबिज हैं.

यह भारत का प्यार और हिंदू-मुस्लिम एकता में विश्वास था, जिसने उन्हें स्वतंत्र भारतीय सेना में सुभाष चंद्र बोस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने के लिए प्रेरित किया.

जनरल शाहनवाज खान का जन्म 24 जनवरी, 1914 को रावलपिंडी में हुआ था. उनके पिता टिक्का खान भी ब्रिटिश फौज में ऊंचे ओहदे पर थे. उनके पिता, सरदार टिक्का खान जंजुआ अपने कबीले के सरदार थे.

शाहनवाज खान 1940 में एक अधिकारी के रूप में ब्रिटिश-भारतीय सेना में शामिल हुए थे. स वक्त तक दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था और उन्हें भी दक्षिण-पूर्व एशिया में तैनाती मिली थी. इसी बीच, दिसंबर 1941 में जापानियों ने सिंगापुर पर हमला कर दिया.

सिंगापुर को बचाने के लिए अंग्रेजों ने ब्रिटिश सेना के साथ भारत से 60,000 भारतीय सैनिकों को सिंगापुर भेजा. इसमें कैप्टन के तौर पर शाहनवाज खान भी शामिल थे. ब्रिटिश सेना की हार हुई और जनरल शाहनवाज खान को हजारों सैनिकों के साथ युद्ध बंदी बना लिया गया. दस्तावेजों के मुताबिक, 40,000 भारतीय सैनिक बंदी बना लिए गए थे.

बहरहाल, सिंगापुर की एक जेल में शाहनवाज खान की मुलाकात क्रांतिकारी सैनिकों से हुई, जो नेताजी के मित्र थे. इस प्रकार वह जल्द ही सुभाष चंद्र बोस के साथ आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए.

उनकी नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें भारत के अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था. दिसंबर 1944 में, उन्हें मांडले में स्वतंत्र भारतीय सेना का कमांडर नियुक्त किया गया.

सितंबर, 1945 में जब नेताजी ने आजाद हिंद फौज के कुछ चुनिंदा सैनिकों के साथ अपनी सुभाष ब्रिगेड का गठन किया, तो जनरल शाहनवाज खान को इसका कमांडर बनाया गया.

जनरल शाहनवाज और उनके सहयोगियों को 1945 में ब्रिटिश सेना के साथ युद्ध के दौरान बर्मा में गिरफ्तार किया गया था. 1946 में उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया. इस मुकदमे के शुरू होते ही पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और जब ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़कर लाल किले में कैद कर लिया.

फिर प्रसिद्ध ‘लाल किला कोर्ट मार्शल ट्रायल’ हुआ, तो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी वकालत की. तीव्र दबाव के कारण, ब्रिटिश सेना को उन्हें रिहा करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

स्वतंत्र भारत में, वह 4 बार संसद सदस्य चुने गए और कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों में मंत्री के रूप में कार्य किया. 1947 में पंडित नेहरू ने उन्हें कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ताओं को सेना की तरह प्रशिक्षण देने का काम सौंपा. 1952 में, जनरल शाहनवाज खान मेरठ निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए. उन्होंने 1971 तक संसद में मेरठ का प्रतिनिधित्व करना जारी रखा. वे 23 वर्षों तक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री रहे और 9 दिसंबर, 1983 को उनका निधन हो गया. उन्हें मौलाना अबुल कलाम आजाद के बगल में दफनाया गया था.

देश को आजाद कराने के लिए जिन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, उन महान देशभक्तों में जनरल शाहनवाज खान का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है, जो स्वतंत्र भारतीय सेना के मेजर जनरल थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सबसे करीबी लोगों में से एक माने जाते थे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *